Showing posts with label काव्य पद. Show all posts
Showing posts with label काव्य पद. Show all posts

Friday, November 30, 2018

क़ातिल निगाहों को उठाइये ज़रा

क़ातिल निग़ाहों को उठाइये ज़रा

---------------------------------------
ये बच्चा सच बहुत बोलता है,यहाँ जी नहीं पाएगा
ज़माने के मुताबिक इसे झूठ भी सिखलाइए जरा

बेशुमार खुशी बयाँ कर दी सरे-महफिल आपने 
हर एक खुशी में छिपा दर्द भी दिखलाइए जरा

ये सारे नए वायदों की सरकार है मेरे हुज़ूरे-वाला
एक बार वोट देके देखिए,फिर मुस्कुराइए जरा

कब तक दूसरों के भरोसे इंक़लाब लाई जाएगी
गर ज़ुल्म हुआ है तो खुद ही शोर मचाइए जरा

आप बुजुर्गों की बस्ती में हैं, इतना तो कीजिए
वो कहें कि बहुत हो चुका तो रूक जाइए जरा

कौन कहता है कि अब आपका हुश्न काम का नहीं
आप अपनी कातिल निगाहों को उठाइए जरा 
--------------------------------------------------------
-सलिल सरोज

Saturday, November 17, 2018

कोरा कागज़

कोरा कागज़

----------------------------------------------------
कोरा कागज़ हूँ मैं
कुछ भी कहना नहीं,
झील बन जाऊँगा
मुझको बहना नहीं,
मुझसे जो रूठा है मेरा ये दिल,
आज उसको मनाने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

रास्ता है अगर
वो मुड़ जाएगा,
टूटा सपना है
फिर से जुड़ जाएगा,
अलविदा जिन ग़मों को मैंने कहा,
आज उनको छिपाने का मन का है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

कुछ खत थे पुराने
कुछ खतो में गुलाब,
मैंने फिर से पढ़े
वो अधूरे जवाब,
जी रही जो मोहब्बत इनके दरमियाँ,
आज उनको जलाने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

डर गए थे
एक छोटे सवाल से,
रखेंगे कैसे
मेरी यादें संभाल के,
एक कसक जो आँखों से आ गई,
पोंछ कर उसको तेरे रुमाल से
आज फिर मुस्कुराने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

कोशिशे कितनी करता है
मेरा ये मन,
न जमीं भूल पाती
और न ये गगन,
शायद नहीं कोई फरियाद में,
लिखी जो ग़ज़ल उनकी याद में,
आज उनको सुनाने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।
_________________________
-रवि पंवार

Thursday, November 8, 2018

याद कीजिये


याद कीजिये

-----------------------------------------
आइये आज उनसे मुलाकात कीजिये, लिख रहा हूँ ग़ज़ल, उनको याद कीजिये। इश्क़-ए-हवा की जुल्फों से एक लट फिसल गयी, हम भी फिसल गए थे, याद कीजिये। उंगलियों को मोड़कर उंगलियों ने जब कहा, कि कुछ हो गया था तुमको भी, याद कीजिये। रात थी हसीन और ज़ुस्तज़ू मेरी, बिखर गयी थी चाँदनी, याद कीजिये। धड़कन भी बढ़ रही थी और हम भी बढ़ रहे, तेरे करीब धीरे-धीरे, याद कीजिये। जब चाँद आसमान से घूंघट में आ गया, मैं कितना बेसबर था, याद कीजिये। वो किसकी थी शरारत, मुझसे लिपट गए, ठंडी हवाएं सर्दियों की, याद कीजिये। बीत न जाये रात, कोई रोक लो इसे, वो रात भर की बाते, याद कीजिये। ढल गयी थी रात और उम्र भी मेरी, मैं वही हूँ आज भी, याद कीजिये। हाथ छोड़ कर मेरा, चल दिए कहाँ, तन्हा लगता था डर तुमको, याद कीजिये। थामूंगा हाथ तेरा, जब तक है जिंदगी, वादा किया था जिंदगी से, याद कीजिये। क्या हुई खता कि, रुक गया मेरा सफर, ऐ हमसफ़र मेरे कुछ तो, याद कीजिये। आ जाइये उन आखों में फिर नूर लौट आये, हंसते थे जिनमे तुम, याद कीजिये। रुख्सतें हो गयीं, रुक सकता अब नहीं, आ रहे हैं हम भी बस, याद कीजिये। मोहब्बतें होती नहीं लिबाज़ से "रवि " और होती हैं बस जब ही, जब याद कीजिये।
------------------------------------------------------------

Monday, September 24, 2018

सावन बरस रहा हो जैसे


सावन बरस रहा हो जैसे

--------------------------------------------------

बूंद बूंद पानी टपक रहा हो जैसे
सावन रिस रहा हो जैसे

वो बूंद की बेबसी 
बादल की जुदाई हो जैसे
तपते बदन पर वो फ़ुहार
मुझको लपेटे हुए हो जैसे
बूंद बूंद पानी टपक रहा हो जैसे
सावन रिस रहा हो जैसे

बूंदो की फुहार 
तन को लपेटे हुए हो जैसे
धरती के आँचल में
बेरक्त बेबस रातो में
साहिल मिला हो सागर से जैसे

बून्द बून्द पानी टपक रहा हो जैसे
सावन रिस रहा हो जैसे
---------------------------------


Sunday, September 9, 2018

इंतजार था


इन्तजार था

-----------------------------------
दूर नजर तक
अधीर फलक तक
वेरंग सा पड़ा था
एक ख्वाब
उसके काले मन में
वेरंग से सपनो पर
इंतज़ार था
उसकी भीगी बारिश का ।।
मन को टटोलते
रंगों की फितरत
बदलते
मानो उतरे
हो कुछ रंग
क्षितिज से अभी अभी
जैसे इंतज़ार था
उसकी भीगी बारिश का ।।
इंतज़ार है
कि हो बारिश सपनो की
मेरे मन की
ऊसर जमीन पर
खुसबू से भर दे
उसके खाली पथ को
जिस पर
इंतज़ार था
उसकी भीगी बारिश का ।।
---------------------------------------
-प्रतीक

Saturday, September 1, 2018

जब तुमको देखा करता था

जब तुमको देखा करता था

----------------------------------------------------------

बंद आँखों से तुमको देखा था
आज नही वो कल था
वो मेरा बीता कल था
हर बीते कल में तुझको खोजा करता था
जब तुमको देखा करता था

उन श्याह काली रातों में
चहुँओर चाँदनी रातों में
दिल की गहरी आमक में
तुमको खोज करता था
जब तुमको देखा करता था

वो बंद खिड़की
खुले आसमान को दिखाती थी
मेरे सपनो पर चलते हुऐ
मेरी नींद दौड़ा करती थी
तुम्हारी सागर जैसी आँखों में
साहिल बन दौड़ा करता था
जब तुमको देखा करता था
---------------------------------
-PRATEEK

Friday, August 24, 2018

मैं एक लड़की हूँ


---------------------------------------                                लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ ,
कब हँसना है कब चुप हो जाना सब जानती हूँ मैं, 
लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ|
कब बैठना है किसके सम्मान में खड़े रहना है अपनी हैसियत की देहलीज पहचानती हूँ, 
क्योंकि लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ |
मैं एक काठ की कठपुतली हूँ जिसके जज्बातो
की कोई कीमत नही, 
 सूख गये अब तो आँसू भी मेरे, इन आँखों में आँसू लाऊँ कैसे, 
रूठ गयी हैं अब तो किस्मत भी मेरी मुझसे, 
इसे मनाऊँ कैसे |
कितना दुःख पाना है सुख की चाह में जानती हूँ मैं, 
क्योंकि लड़की हूँ मैं, अपनी मर्यादा जानती हूँ मैं |
ना जानने का हक है मुझे घर के बाहर की दुनिया ,घर की देहलीज को ही सबकुछ मानती हूँ मैं, 
लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ ||
तन्हाई मेरी साथी है, आँसू मेरी किस्मत इन्हें ठुकराऊँ कैसे, 
रूठ गयी मेरी किस्मत मुझसे इसे मनाऊँ कैसे, 
लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ, 
इस कड़वे सच को ठुकराऊँ कैसे, 
कभी जन्म से पहले ही मार दी जाती हूँ, 
और अगर बच गयी तो दहेज के नाम पर जला दी जाती  हूँ, 
क्योंकि मै एक लड़की हूँ, और अपनी मर्यादा जानती हूँ |
मैं किसी की बेटी बन घर को किलकारियो से गुंजा जाती हूँ, 
फिर भी ना जाने क्यूँ मार दी जाती हूँ, 
कभी किसी की बहन बन अपने  भाई की सुरक्षा की मन्नते मांगती हूँ, और खुद ही दहेज के नाम पर असुरक्षित हो जाती हूँ, 
क्योंकि मै एक लड़की हूँ? 
कहीं पर मै एक माँ हूँ फिर भी धन के लालच में अपने ही बेटे के हाथों मारी जाती हूँ, 
जिस परिवार में कदम रख उसे संवारा हैं, उस परिवार को मुझे दो पल की  खुशियाँ देना लगता अब गवारा है, 
क्योंकि मै एक लड़की हूँ  ?
अपनी मर्यादा जानती हूँ ||
-----------------------------------------------------------------
-नवनीता

Wednesday, July 25, 2018

मेरे आंगन के पेड़ से


मेरे आंगन के पेड़ से

-----------–--–-----------------------
अठखेलियाँ खाती, अपने केश बिखराती,
रंग बिरंगे फूलों के गहनों से सजी,
एक लता बेवजह लिपट गई
मेरे आँगन के पेड़ से।
 
कहाँ से निकली पता नहीं,
कहाँ रुकेगी पता नहीं,
पर बाँध लेगी अपनी बाँहों में बेसुध,
मोहब्बत सी हो गई जैसे
मेरे आँगन के पेड़ से।
 
डाल से डाल चलने लगे,
पात से पात हिलने लगे,
दो शरीर एक जान से
एक दूसरे मे वो मिलने लगे,
नहीं मिली अगर वजह,
पूछना उनका परिचय,
मेरे आँगन के पेड़ से।
 
कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते हैं,
वो मूक होते हैं,
अकल्पनीय किन्तु विस्तृत,
उस असीम प्रेम की तरह
उलझे हुए,
धूप, जाड़े और बारिश में,
मेरे आँगन के पेड़ से।
--------------------------------------------------
-रवि पँवार

Saturday, July 14, 2018

जिस मृग पर कस्तूरी है

जिस मृग पर कस्तूरी है

---------------------------------------

मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की
जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं
हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

- कूअर बेचैन

Wednesday, July 11, 2018

मजा आता है

मजा आता है

----------------------------------

पिघल जाए मोम, तो बाती को जलने में मज़ा आता है,
साथ हो अपने तो सूरज के ढलने में मज़ा आता है,
और चुनौतियों का शौक होता है जिन्हें,
उन्हें पत्थरों पर चलने में मज़ा आता है।
नौरस के दिनों की उफ़
नींद को भी सोने में मज़ा आता है,
और वो खुशी के होते हैं,
हर एक आँसू को रोने में मज़ा आता है।
कायर हैं जो बदनसीब,
उन्हें हर पल डरने में मज़ा आता है,
है मोहब्बत अगर वतन के लिए,
तो हर शहीद को मरने में मज़ा आता हैं।
पागल दरअसल पागल नहीं होता,
उसे खुद से उलझने में मज़ा आता है,
खुदा सा दोस्त मिल जाए अगर,
तो गिर के सम्भलने में मज़ा आता है।
उतार सका क़र्ज़ माँ का अगर
तो मुझको बिकने में मज़ा आता है,
क्या-क्या लिख देती है रवि की कलम,
सच कहूँ तो उसको लिखने में मज़ा आता है।

- रवि पंवार

Wednesday, June 20, 2018

वो कुछ लम्हें...


वो कुछ लम्हें.....

---------------------------------------
वो कुछ पल जो बयां नही किये जा सकते
कैसे कह दूँ वो लम्हें भुलाये नही जा सकते
तुम्हारे होठों की वो पहली छुवन
सांसो की वो गरमाहट
तुम्हरी जुल्फों के वो वेराहे रास्ते
जो शायद तुझ तक नही जाते ..
उस रास्ते के वो दर्द बयां नही किये जा सकते
कैसे कह दू वो लम्हे भुलाये नही जा सकते....|

आज यादों ने मुझसे मिलने की कोशिश की है
उन यादों में थोड़ी धुन्दलाहट सी है
तुमको न पाने की बेबसी भी है
यादों की श्याही समय के पन्नो पर
बड़ी लाचार सी लगती है
पन्नो का क्यों मुझमे एकीकार नही किया जा सकता
फिर कैसे कह दू की उन लम्हों को भुलाया नही जा सकता ||

Sunday, April 22, 2018

ये पूछा मत करो

ये मत पूछा करो

--------------------------------

मुझसे होता न बयाँ, ये पूछा मत करो,
राज दिल में है क्या, ये पूछा मत करो।
रात बनके हवा छू लिया था तुम्हें,
ख्वाब था या हक़ीक़त, ये पूछा मत करो।
देखा तुमको तो ये परेशान हो उठी,
इन आँखों की गुफ्तगू, ये पूछा मत करो।
जब नहीं आए तुम हिचकिया आ गई,
पर आई कितनी दफा, ये पूछा मत करो।
जब जानते हो कहेंगे हम "सुभानअल्लाह",
कैसे दिखते हो तुम, ये पूछा मत करो।
तहजीब इतनी कि मुकर जाते हैं हम,
क्या प्यार है हमसे, ये पूछा मत करो।
चल दिया उठ कर कहाँ ये पूछा तो करो,
कर दूंगा मना कि, ये पूछा मत करो।
मैं तो मिर्ज़ा था सिर्फ तेरा रहनुमा,
क्यों ग़ालिब बन गया, ये पूछा मत करो।

-Ravi Panwar

Saturday, April 14, 2018

सुकून



सुकून

--------------------
हैरान सा परेशान सा,
घर से निकल गया,
सोचा मिल ही जाएगा रास्ता,
जो सभी रास्तों का छोर हो।

मैंने सोचा मेरे ग़मों की सीमा नहीं,
हर जगह ढूंढा पर कहीं भी सुकून नहीं।
फिर स्टेशन की सीढ़ियों से उतरते हुए, काँपते हुए,
फटी सी बुर्शट में खुद को छिपाते हुए,
कोई मेरी तरफ देखने लगा, मानो मैं ही हूँ उसका किनारा।

एकाएक रख दिए मैंने उसके हाथ पर
माँ के दिए परांठे, शायद किसी को तो किनारा मिले,
वो मुस्कुराया, उसके चेहरे की हजार सलवटों पर आराम सा छा गया,
बंजर वसुधा से मिलने मानो सावन आ गया।

वो तेज़ी दिखा रहा था और मैं मंद,
वो अन्न खा रहा था और मैं आनंद,
स्वाद भूख में था, और भूख सुख की,
तृप्त वो भी हो गया, और मेरा दुःख भी।
By- Ravi panwar

Friday, March 30, 2018

आइना

"आइना...."

वो मुस्कराता हुआ आइना 
उसको देख देख इठलाता है
उसकी उन बिखरी हुई लज्मो को 
व्यथित गीत बनाता है

उसकी गालो की मृदुता देख
खुद से आँख चुराता है
उसके होंठो की वो लाली 
खिलते गुलाब को रिझाती है 

वो मीठी झील सी आँखे 
मेरे दिल की प्यास बुझाती है
मेरा मन कुछ यूँ आईने से 
एक प्रश्न करता जाता है
वो मुस्कराता हुआ आईना 
उसको देख देख क्यू इठलाता है
---------------------------------------

Monday, March 5, 2018

वो साथ तुम्हारा चाहता है



वो साथ तुम्हारा चाहता है 

------------------------------------
उस ब्याकुल ,निराश ,विक्षित ह्रदय को,
मृदु भाषाई गीत सुनांना चाहता है 
इस हताश जीवन संग तुम्हारा चाहता है 
वो साथ तुम्हारा चाहता है ||

हैं एक गीत उसके सपनों में तुम्हारा ,
मन उन गीतों की डोर संग उड़ना चाहता है 
वो उस डोर संग बंधन तुम्हारा चाहता है 
वो साथ तुम्हारा चाहता है ||

डर है कहीं डोर जीवन का साथ न छोड़ दे,
ह्रदय उस व्यथा से मचलता है,
इस निराशा से लड़ने को वो संग तुम्हारा चाहता है,
वो साथ तुम्हारा चाहता है ||

कितना मोहक है साथ तुम्हारा ,
पंछि रोज़ ये राग सुनाता है,
कहीं टूट न जाये सपना ,
उन सपनों में वो साथ साथ तुम्हारा चाहता है ,
वो हाथ तुम्हारा चाहता है ||

Friday, February 16, 2018

याद है




याद है 

धीरे धीरे रात दिन दिल का फिसलना याद है
हमको तुम्हारी आशिकी में सिसकना याद है ....
वो दिल का धडकना तेरा ,
वो चेहरे का खिलना तेरा,
हमको तुम्हारे चेहरे का वो शर्माना याद है
धीरे धीरे रात दिन दिल का फिसलना याद है
हमको .........................................
शाम डले छुपना तेरा ,
चाँद टेल निकलना तेरा ,
तुझे देख कर वो चाँद का जलना याद है .
हमको तुम्हारे चेहरे का वो शर्माना याद है.....
धीरे धीरे ....................

Thursday, January 11, 2018

मेरा दिल......





प्यार आपका अब कुछ इस कदर हम पर छा रहा है
मेरा दिल मुझे मेरे महबूब का दिल ए हाल बता रहा है
बड़ा समझाया इस दिल ए नादान को
पर ये तो मस्त गगन में उड़ता ही चला जा रहा है
प्यार आपका अब कुछ इस कदर हम पर छा रहा है
मेरा दिल मुझे मेरे महबूब का दिल ए हाल बता रहा है

चाहता है अब ये दिलबर को अपने सामने हर पल
महसूस करना चाहता है उसकी सांसो को अपनी सांसो में हर पल
इसको भी अब खुद पर कुछ ज्यादा ही एतबार आ रहा है
प्यार अब कुछ इस कदर हम पर छा रहा है
मेरा दिल मुझे मेरे महबूब का हाल ए हाल बता रहा है

कहता है बस कुछ दिन और इंतजार, फिर हम एक हो जायेंगे
जो जो सपने संजोये थे हमने सब के. सब पूरे वो हो जायेगे
अब तो गौरव को भी शिखर का इंतज़ार हो रहा है
प्यार अब कुछ इस कदर हम पर छा रहा है
मेरा दिल मुझे मेरे महबूब का दिल ए हाल बता रहा है

मिले थे जो कभी हमें अनजान बनकर ,वो अब अपने हो जायेंगे
हर कोई शायद अब हमारे प्यार के साथ होगा
दिल को इस गुमान पर गुमान आ रहा है
प्यार अब कुछ इस कदर हम पर छा रहा है
मेरा दिल मुझे मेरे महबूब का दिल ए हाल बता रहा है ।


Tuesday, January 9, 2018

सादगी



सादगी उनमें कितनी थी शायद हम जान ना सके,
मोहम्मद कितनी थी हमें शायद हम जान ना सके, ।

उनका मुस्कुराना हमने देखा
उनका रोना हमने देखा
उनका हमारी हर बात पे हंसना
और खुशी में झूमना देखा,
उनके दिल में दर्द कितना था हम जान  सके,
मोहब्बत कितनी थी हमें शायद हम जान ना सके ।

हमारे लिए कितना तड़पते थे
हाल ए दिल शायद हम ना  समझते थे,
उनकी खुशी की वजह हम थे
उस बजह को ही हम जान ना सके,
मोहब्बत कितनी थी हमें शायद हम जान सके।

कोशिश तो बहुत कि थी उन्हे अपना बनाने की,
हाथ से हाथ जब फिसल गया हम जान ही ना सके,
उन्हे हमसे मोहब्बत कितनी थी शायद हम ही  जान सके,
हमने  उन्हें जान और ना उनकी मोहब्बत को ,
और हम सोचते रहे,


मोहब्बत कितनी थी हमें शायद हम जान ही ना सके ।

दिल चाहता है



फिर से वो पल जीने को जी चाहता है ,
दोबारा जीने को वो जिंदगी दिल चाहता है |

बहुत कोशिशो के बाद जीना सीख लिया था ,
समय के मरहम से दर्द को छुपाना सीख लिया था,
कुछ दिनों से लगता है जैसे खुद से मिल गया हूँ मै ,
खुद से खुद को जुदा करना कौन चाहता है ,
फिर से वो पल जीने को जी चाहता है 
दोबारा जीने को को जिन्दगी दिल चाहता है ||

बड़ी बेरुखी से टूट गया वो धागा ,
जो मन को बांधे रखता था ,
बड़ी मासूमियत से छूट गया वो हाथ 
जो हमको थामे रखता था 
उस धागे संग बिछडना कौन  चाहता है 
फिर वो पल जीने को जी चाहता है.
दोबारा जीने को वो जिन्दगी जी चाहता है ||

Wednesday, January 3, 2018

तेरा शाम को टहलना याद है

HD Wallpaper | Background ID:422813

तेरा शाम को टहलना याद है
तुझे देख दिल का खिलना याद है,

यू तो फूँक फूँक कर कदम रखते थे हम ,
पर तेरी चाल पर दिल का फिसलना याद है ,

तेरी खूबसूरती की चर्चा थी उन दिनों,
क़त्ल करने निकलती थी जब सड़को पर,

यूँ तो दीवाने बहुत थे तेरे,
पर मेरे दिल के लिए तेरे दिल का मचलना याद है,
तेरा शाम को टहलना याद है |

सुना था बहुत पत्थर दिल है तू,
फिकर नही थी किसी की तुझे,
पर जब दर्द कभी उठा मुझे तो ,
तेरा मोम की तरह पिघलना याद है;
तेरा शाम को टहलना याद है, |

अजीब नियम थे तेरे प्यार के लिए ,
बहुत नीच सामझती थी तू इसे,
मेरी क्या कशिश थी मेरे प्यार की,
तेरा गिर कर बदलना याद है,
तेरा शाम को टहलना याद है |

बे-लगाम  थी जिन्दगी मेरी ,
मारा मारा फिरता रहता था ,
जब हुई मोहब्बत तुझसे ,
तेरी यादो में डलना याद है ,
तेरा शाम को टहलना याद है, |





अनोखा रिश्ता

अनोखा रिश्ता-1 ---------------------------------------------- शाम का समय था लगभग 7 बजे होंगे ,एक टेबल पर बैठा करन कॉफी पी रहा था चार...