Showing posts with label रवि पंवार. Show all posts
Showing posts with label रवि पंवार. Show all posts

Saturday, November 17, 2018

कोरा कागज़

कोरा कागज़

----------------------------------------------------
कोरा कागज़ हूँ मैं
कुछ भी कहना नहीं,
झील बन जाऊँगा
मुझको बहना नहीं,
मुझसे जो रूठा है मेरा ये दिल,
आज उसको मनाने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

रास्ता है अगर
वो मुड़ जाएगा,
टूटा सपना है
फिर से जुड़ जाएगा,
अलविदा जिन ग़मों को मैंने कहा,
आज उनको छिपाने का मन का है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

कुछ खत थे पुराने
कुछ खतो में गुलाब,
मैंने फिर से पढ़े
वो अधूरे जवाब,
जी रही जो मोहब्बत इनके दरमियाँ,
आज उनको जलाने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

डर गए थे
एक छोटे सवाल से,
रखेंगे कैसे
मेरी यादें संभाल के,
एक कसक जो आँखों से आ गई,
पोंछ कर उसको तेरे रुमाल से
आज फिर मुस्कुराने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।

कोशिशे कितनी करता है
मेरा ये मन,
न जमीं भूल पाती
और न ये गगन,
शायद नहीं कोई फरियाद में,
लिखी जो ग़ज़ल उनकी याद में,
आज उनको सुनाने का मन है मेरा,
उन्हें भूल जाने का मन है मेरा।
_________________________
-रवि पंवार

Thursday, November 8, 2018

याद कीजिये


याद कीजिये

-----------------------------------------
आइये आज उनसे मुलाकात कीजिये, लिख रहा हूँ ग़ज़ल, उनको याद कीजिये। इश्क़-ए-हवा की जुल्फों से एक लट फिसल गयी, हम भी फिसल गए थे, याद कीजिये। उंगलियों को मोड़कर उंगलियों ने जब कहा, कि कुछ हो गया था तुमको भी, याद कीजिये। रात थी हसीन और ज़ुस्तज़ू मेरी, बिखर गयी थी चाँदनी, याद कीजिये। धड़कन भी बढ़ रही थी और हम भी बढ़ रहे, तेरे करीब धीरे-धीरे, याद कीजिये। जब चाँद आसमान से घूंघट में आ गया, मैं कितना बेसबर था, याद कीजिये। वो किसकी थी शरारत, मुझसे लिपट गए, ठंडी हवाएं सर्दियों की, याद कीजिये। बीत न जाये रात, कोई रोक लो इसे, वो रात भर की बाते, याद कीजिये। ढल गयी थी रात और उम्र भी मेरी, मैं वही हूँ आज भी, याद कीजिये। हाथ छोड़ कर मेरा, चल दिए कहाँ, तन्हा लगता था डर तुमको, याद कीजिये। थामूंगा हाथ तेरा, जब तक है जिंदगी, वादा किया था जिंदगी से, याद कीजिये। क्या हुई खता कि, रुक गया मेरा सफर, ऐ हमसफ़र मेरे कुछ तो, याद कीजिये। आ जाइये उन आखों में फिर नूर लौट आये, हंसते थे जिनमे तुम, याद कीजिये। रुख्सतें हो गयीं, रुक सकता अब नहीं, आ रहे हैं हम भी बस, याद कीजिये। मोहब्बतें होती नहीं लिबाज़ से "रवि " और होती हैं बस जब ही, जब याद कीजिये।
------------------------------------------------------------

Wednesday, July 11, 2018

मजा आता है

मजा आता है

----------------------------------

पिघल जाए मोम, तो बाती को जलने में मज़ा आता है,
साथ हो अपने तो सूरज के ढलने में मज़ा आता है,
और चुनौतियों का शौक होता है जिन्हें,
उन्हें पत्थरों पर चलने में मज़ा आता है।
नौरस के दिनों की उफ़
नींद को भी सोने में मज़ा आता है,
और वो खुशी के होते हैं,
हर एक आँसू को रोने में मज़ा आता है।
कायर हैं जो बदनसीब,
उन्हें हर पल डरने में मज़ा आता है,
है मोहब्बत अगर वतन के लिए,
तो हर शहीद को मरने में मज़ा आता हैं।
पागल दरअसल पागल नहीं होता,
उसे खुद से उलझने में मज़ा आता है,
खुदा सा दोस्त मिल जाए अगर,
तो गिर के सम्भलने में मज़ा आता है।
उतार सका क़र्ज़ माँ का अगर
तो मुझको बिकने में मज़ा आता है,
क्या-क्या लिख देती है रवि की कलम,
सच कहूँ तो उसको लिखने में मज़ा आता है।

- रवि पंवार

Sunday, April 22, 2018

ये पूछा मत करो

ये मत पूछा करो

--------------------------------

मुझसे होता न बयाँ, ये पूछा मत करो,
राज दिल में है क्या, ये पूछा मत करो।
रात बनके हवा छू लिया था तुम्हें,
ख्वाब था या हक़ीक़त, ये पूछा मत करो।
देखा तुमको तो ये परेशान हो उठी,
इन आँखों की गुफ्तगू, ये पूछा मत करो।
जब नहीं आए तुम हिचकिया आ गई,
पर आई कितनी दफा, ये पूछा मत करो।
जब जानते हो कहेंगे हम "सुभानअल्लाह",
कैसे दिखते हो तुम, ये पूछा मत करो।
तहजीब इतनी कि मुकर जाते हैं हम,
क्या प्यार है हमसे, ये पूछा मत करो।
चल दिया उठ कर कहाँ ये पूछा तो करो,
कर दूंगा मना कि, ये पूछा मत करो।
मैं तो मिर्ज़ा था सिर्फ तेरा रहनुमा,
क्यों ग़ालिब बन गया, ये पूछा मत करो।

-Ravi Panwar

अनोखा रिश्ता

अनोखा रिश्ता-1 ---------------------------------------------- शाम का समय था लगभग 7 बजे होंगे ,एक टेबल पर बैठा करन कॉफी पी रहा था चार...