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Thursday, December 6, 2018

अनोखा रिश्ता


अनोखा रिश्ता-1

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शाम का समय था लगभग 7 बजे होंगे ,एक टेबल पर बैठा करन कॉफी पी रहा था चारो ओर लोग बैठे हुए थे हल्की हल्की नीली रोशनी हो रही थी 
करन की उम्र लगभग 30 के आसपास होगी । गोरा रंग , मासूम सा चेहरा ,चेहरे पे हल्की सी मुस्कान हमेशा रहती थी उसे देख कर ऐसा लगता था कि यह मुस्कान झूठी है ,अपने मन को हल्का रखने के लिए सिर्फ दिखावट है । जिस तरह एक बीमार ब्यक्ति को खूबसूरत कपडे पहना दिए गए हों ।
" माफ़ करना करन यार आज फिर लेट हो गयी "
'ये तुम्हरा हर बार का काम फिर माफ़ी क्यूँ मांगती हो'
" कसम से मेरी जान ,आज बहुत ज्यादा जरूरी काम आ गया था"
'अच्छा ! जरा मुझे भी तो बता की कितना जरूरी था तेरा काम'
"अरे वो आकाश है ना , वो मुझे कॉफी के लिए पूँछ रहा था ,बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ा कर आयीं हूँ ।"
'वही आकाश ना जो तुमसे प्यार करता है , बेचारे को क्यूँ परेशान कर रही हो '
"अच्छा , बड़ी फ़िक्र हो रही है उसकी चल ठीक है तेरी बात मान ली , बस एक शर्त पर "
'बोल क्या शर्त है'
"अपनी डायरी दे मुझे पड़ने को"
'मरने दे साले को मुझे क्या पड़ी है'
करन का जबाब सुनकर कविता जोर से हँसने लगी । करन की दोस्ती कविता से लगभग 8 सालो से थी वो कॉलेज एक साथ पड़े थे कविता करन के बारे में उसके परिवार के बारे में सबकुछ जानती सिवाय उसकी डायरी के ।
"अच्छा करन, एक बात बता ये डायरी मुझे क्यूँ नही पड़ने देता , कम से कम कारण तो बता ,जिससे मुझे तसल्ली तो रहे "
'तुझे में मना कर कर के परेशान हो गया पर तू है कि मानती ही नही , क्या करेगी इसे पढ़कर '
"करन प्लीज ,तेरे हाथ जोड़ लूँ "
'हट पागल क्या कर रही है , तू मेरी सबसे अच्छी दोस्त है ऐसा नही करते '
"दोस्त भी कहता है और बात भी नही मानता "
'अरे मेरी प्यारी दोस्त समझा करो ,अगर तुमने इसे पड़ा तो हमारी दोस्ती ख़तम हो जायेगी '
"वो क्यूँ"
'बस ऐसे ही '
कविता और करन वहाँ बहुत देर तक बात करते रहे और फिर चले गए , डायरी का विषय उनका रोज़ का था ,कविता पड़ने के लिए मांगती थी और करन मना कर देता था । लेकिन कविता की समझ में ये नही आता था कि वो उसकी दोस्त वो उसके लिए कुछ भी करने के लिए तैयार था फिर एक डायरी को क्यों नही दे रहा था ।
क्रमशः
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Thursday, November 29, 2018

मेहरी

मेहरी

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चारों तरफ चहल पहल थी लोग इधर उधर अपने काम के लिए जा रहे थे गांव का पूरा बतावरण मन को मोहने वाला था । ठंडी ठंडी हवा चल रही थी , दूसरी ओर बच्चे अपनी जिंदगी के उन हसींन पलो में खोए हुए थे जो बाद में एक कल्पना मात्र रह जाते है । लोग अपने अपने जानवरों को घर की ओर ला रहे थे ।
       उधर एक कोने में मालिक बाबू अपनी चारपाई पर लेटे हुए थे चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ देखि जा सकती थी उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में धन भले ही अधिक ना कमाया हो लेकिन मान सम्मान को भर पाया था गांव का कोई भी ब्यक्ति उधर से होके जाता तो बाबूजी से राम राम करके अवश्य जाता था लेकिन आज बाबूजी राम नाम से ज्यादा  मन की शंका में घिरे हुए थे कोई शंका उन्हें मन ही मन खाये जा रही थी ।
   बाबूजी के परिवार में उनके दो बड़े बेटे श्याम और शेखर , एक बेटी मेहरी और बूढ़ी काकी ।  दोनों बेटों का विवाह हो चूका था और मेहरी भी विवाह योग्य हो चुकी थी । काकी पूरा दिन राम नाम जपती रहती थी  बाबूजी की दोनों पुत्रबधु शायद आधुनिक थी तो बाबूजी और काकी ने इसे अपने भाग्य का खेल मानकर रह गए । अब ना खाने की फ़िक्र थी जब बहु का मन होता तब ही खाना बनता या उनके पति गर्म खाना खाना चाहते हो । लेकिन बाबूजी ने अपने भाग्य के साथ समझौता कर लिया था  अब उन्हें एक ही उलझन थी ' मेहरी' ।
    हर समय उन्हें यही बात अंदर ही अंदर दीमक की तरह खाये जाती थी कि उसकी बेटी का घर कैसा होगा , उसका भाग्य में क्या हमारे जैसे होगा ये सब सोचते सोचते उनकी आँखों से आंसू छलक आते , और ये सब देख काकी भगवान को कोसती रहती ' काश' इतना कहने के बाद काकी हमेशा बाबूजी को देखती और खुद को कुछ कहने से रोक लेती ।
   उस शाम जब बाबूजी अपनी चारपाई पर बैठे थे और विचार कर रहे थे तभी उन्हें ना जाने क्या विचार आया कि बाबूजी के पैर किसी नवयुवक की गति से आगे बढ़ रहे थे उन्हें देख इस लग रहा था कि मानो कोई नवजवान नवजीवन की और अग्रसर हो रहा हो । लेकिन उम्र का तकाजा कहिये या बेटी की शादी की बेड़ियां जिन्होंने बाबूजी के पैरों को बांध रखा था और उनकी गति उस बंधन के कारण मंद होती चली गयी ।
     अपनी चारपाई पर वापस आकर अपनी इस बेबस हालत पर दुखी होने लगे तभी अंदर से खिलखिलाने की आवाजें आने लगी । इन आवाजों ने घी का काम किया , जो आग ना जाने कब से शांत थी आज वो उठने वाली थी  
     शेखर' उन्होंने अपने बड़े बेटे को आवाज लगायी । दो चार बार सुनने के बाद भी उनका बेटा नही आया । उनकी शर्म , लाज और समाज की बेड़ियों ने उन्हें अंदर जाने से रोक रखा था । कुछ देर बाद उनका बेटा हँसता हुआ बाहर आया । अपने बाबूजी के तिलमिलाते चेहरे को देख कर उसकी हँसी रुक गयी ।
" क्या हुआ बाबूजी क्यों चिल्ला रहे थे"
एक पिता के सम्मान को एक तरफ रख अपने रास में ब्यस्त ,बेशर्मी से भरा जबाब देकर शेखर ने उनकी जिंदगी भर के सम्मान को ख़त्म कर दिया था
  बाबूजी अपनी ताकत से खड़े हुए और कुछ देर सोचने के बाद एक जोरदर थप्पड़ अपने बेटे के गाल पे दे दिया ।
  थप्पड़ की आवाज सुनकर शेखर की पत्नी ,श्याम और मेहरी सभी लोग देखते रह गए , जो हाथ जीवन में आज तक न उठा वो आज क्यों ।
 चारो और शंनाटा छा गया था ,बाबूजी का गला भर गया था, एक कोने में कड़ी मेहरी रोये जा रही थी, केवल एक आवाज बाबूजी के गले से निकल पायी और वो भगवान को प्यारे हो गए
" मेहरी "।।

Monday, November 19, 2018

प्रेमवाणी-1

प्रेमवाणी-1

प्रेमवाणी-1
प्रतिदिन सूर्य उदय होने के साथ ही जाग उठते है कुछ सपने ,सपनो के लिए संघर्स, कुछ कहानिया, कुछ इच्छाएँ, कुछ अनकहे संघर्स ,कुछ यात्राएँ और इनके साथ ही जगता है वो प्रेम ..जिसके लिए ह्रदय व्याकुल है , व्याकुल है उस प्रेम मै खोने को |
     लेकिन सभी सपने पूरे नही होते, ना ही हमारे संघर्षो के प्रयास पूरे होते है, सभी कहानिया पूरी नही होती, सभी इच्छाएं पूर्ण नही होती, कुछ संघर्स हम हार जाते है, और हमारी यात्राएँ रह जाती है अधूरी |
अब आपमें से ही कुछ लोग कहेंगे कि सफलता का प्रयास पूर्ण रूप से नही किया गया, तो कुछ कहेंगे कि सपने ज्यादा बड़े थे, कुछ आत्मशक्ति को कम कहेंगे, कुछ लोग इस असफलता का सारा बोझ भाग्य के ऊपर डाल देते है |
        लेकिन इस सब का कारण सिर्फ एक है , कमी है ढाई अक्षर की, कमी है प्रेम की ||
वो प्रेम जो समाज से नही मिला, परिवार से नही मिला , साथी से नही मिला और इस प्रेम कि व्याकुलता ने जन्म दिया असफलता को |
प्रेम,
प्रेम जो ना अब समाज में मिलेगा , ना रिस्तो में , ना किताबो में , ना इंसानों में ....तो आखिर ये प्रेम है क्या ?, ये प्रेम मिलेगा कहाँ ?, क्या मार्ग है प्रेम पाने का ,........यही प्रयास रहेगा आपको समझाने का |
  तो आइये भागी बनिए इस यात्रा का , साक्षी बनिए इस वाणी का , जो मिठास से भरी है .केवल एक बार इसे मन से , दिल से ,प्रेम स्मरण करना होगा इस वाणी को , प्रेमवाणी को ||
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Thursday, April 19, 2018

वो बंद खिड़की


वो बंद खिड़की....?

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वो बंद खिड़की
वो शाम का समय था ज्यादातर लोग अपने अपने घरो से बाहर निकल रहे थे ऐसा लग रहा था मनो उन सब को उस मतवाली पवन ने बुलाया हो और वो सब एक अपनी प्रीयता से मिलने के लिए जा रहे थे ऐसा लग रहा था मानो एक पल की देरी भी इन्हें एक असहनीय वियोग का अनुभव करा रही हो | में भी उस भीड़ में शामिल हो गया | मै चल तो रहा था  पर मानो ऐसा लग रहा था की पवन मुझे अपने साथ कही ले जा रही हो , में अपने बिना गंतव्य की परवाह किये मैने खुद को उसके हवाले कर दिया |
     अभी कुछ समय भी नही गुजरा होगा कि मुझे पवन के झोंको ने मेरे सपनों से बाहर निकाला | मै अपनी वास्तविक दुनिया में आया , मै खुद के चारों तरफ़ देख रहा था ,एकाएक मेरी नजरें पवन के झोंके का पीछा करते हुए एक खिड़की पर गयी | ऐसा लगा मानो दुनिया थम सी गयी हो ..उसकी वो आँखे |
    पर पवन का इरादा कुछ और ही था उसने अपनी अठखेलिय थोड़ी बड़ा दी और अपने हाथो से उसकी बालों की लटों को सवारने लगी ,ऐसा लग रहा था मानो वो उसके स्पर्श से मुझे चिड़ा रही हो ,उसके बाल हवा में लहरा रहे थे उसके गालों की लाली मुझको रिझा रही थी में कुछ पल के लिए उस पल में खो गया और उस मासूमियत सी सूरत में खो गया ...में उसकी पलकों के उठने का इंतज़ार करता रहा पर शायद वो भी पवन के साथ मिली हुई थी मै उस पल को हवा का एक तोफा समझ कर उसे एक याद के रूप में रख लिया |
       अब तो हर रोज़ उस रोज़ का इंतज़ार होने लगा था खुद को बड़ी मुस्किल से याद रख पा रहा था खुद से खुद की जंग से होने लगी थी अगर आँखे बंद करता तो उसकी बंद पलकें आँखे खोलने न देती और अगर आँखे खोलता तो पल पल बेचेनी हो रही थी आखिर खुद ने खुद से एक समजौता किया खुद को “खुद*” के हवाले कर दिया मेने | पर खुद से खुद को हार कर भी जीता हुआ महसूस कर रहा था
  मै हर रोज़ वहा जाने लगा मुझे वो उसी जगह पर बैठी हुई मिलती है ऐसा लगता था मानो वो भी मेरा इंतज़ार कर रही हो | मै उस पल को कैद कर लेना चाहता था उस पल के साथ खो जाना चाहता था उस अनजानी चाहत को पहचान देना चाहता था मै उसे अपना बनाना चाहता था में उसे रोज़ इसी तरह मिलने लगा पर अब बेबसी बडती जा रही थी उसकी पलकों कि खिड़की कब खुलेगी |
     धीरे धीरे एक महिना गुजर गया | उसकी एक मुस्कराहट हर दुःख दूर कर देती थी उसकी दूरी अब सहन नही होती थी हर पल ख्याल आता था उसकी आँखे कैसी होंगी आँखों की वो नीली हया आँखों को सुकून देती थी जब पवन उसके होठों खो छूके गुजरती थी तो दिल में एक सिरहन सी दौड़ जाती थी फिर खुद उसके होठों को अपने होठों पर महसूस करता और उन बंद आँखों के सपनों में खुद को जीवंत महसूस करता |
        वही शाम का समय था सभी लोग फिर से अपनी प्रेयसी से मिलने जा रहे थे मै भी अपनी प्रेयसी से मिलने जाने लगा, पर आज हवाओ का रुख कुछ बदला बदला सा लग रहा था ऐसा लग रहा था मानो वो मुझे आज ले जाना नही चाहती थी पर में खुद खो रोक न पाया और चलने लगा मन में एक अजीब सी बैचेनी हो रही थी वहां पहुँच कर खुद की नजर उठाने की हिम्मत नही हो रही थी खुद को उसकी नजरों का पीछा करने को कहा और नजरे उस बंद खिड़की पर जाके रूक गयी, दिल को दर्द का एहसास हुआ पर आँखों ने बगावत कर दी खुद को ना रोक पायी और बगावत का नीर उन आँखों से बहने लगा | साँसों के साथ बहता दर्द आँखों से मिल रहा था
    फिर खुद को दिलासा दी और उस मकान की सीड़ियाँ चड़ने लगा ..हर एक पल उस पल की याद दिला देता जब उसकी नज़रों से मिलन हुआ था दिल एक अनहोनी की आहत से घबरा जाता | जब उसके कमरे के दरवाजे के पहुंचा तो उसे खोलने की हिम्मत ना हुई | एक झटके के साथ दरबाजा खोला अन्दर का नजारा एक अनहोनी को बयां कर रहा था सब कुछ खाली था बस एक खाली कुर्सी और एक बैसाखी थी जो अनहोनी का संकेत थी फिर नजर उस बंद खिड़की पर गयी, एक ख़त को देखा ,एक डर के साथ उसे खोला जब उसे पड़ने लगा था आँखों ने एक बार फिर बगावत कर दी|
    “इन आँखों की खता को माफ़ कर देना , पर में उन सपनों को नही खोना चाहती जो तुमने मुझे दिए ...जब तुम्हे पता चलता कि मेरे पैर नही है तो शायद तुम मुझे छोड़ देते इस ख्याल से ही में जा रही हूँ अब तक खुद को तो बचा लिया, पर खुद के अंश को कैसे बचाउंगी |
   मेने इस खिड़की से उस दुनिया को देखा है जो बहुत जालिम है हमें जीने का हक़ देना नही चाहती एक ओर आप प्यार की चाहत करते हो दूसरी ओर हमें जीने देना नही चाहते हो .....उस दुनिया में कैसे कदम रखू एक खौफ से भरी हुई है हर पल उन भेडियों की नजरों से बचना पड़ता है हर पल उन जालिमों का साया पीछा करता है
     तुम्हारी मोहब्बत का डर नही है डर तो उस बात का है की अपनी इस मोहब्बत की निशानी को दुनिया में कैसे लाऊंगी , अपनी उस लाड़ली को इन हैवानों से कब तक बचाउंगी ...उसे इस दुनिया में लाने से डर लगता है”
     इस से आगे पड़ ना पाया ,खुद को खुद की नजरों में गिरा हुआ पाया ऐसा लगा मानो उसकी इन बातों का क्या जबाब देता ...उसके लिए इस बंद खिड़की को कैसे खोल पाता क्युकी में भी इसी भेडियों के समाज का हिस्सा हूँ
     आज उस खिड़की खो खोलना चाहता हूँ उसे इस दुनिया से मिलाना चाहता हूँ उसे बताना चाहता हूँ की एक दिन ये लोग जरूर बदलेंगे | पर एक सवाल उस बंद खिड़की खोलने ने रोकता है
“क्या ये लोग बदलेंगे ...?”   
आपकी राय जरूर.......”वो बंद खिड़की”
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  -अनिल शर्मा

Wednesday, April 18, 2018

भगवान की खोज

भगवान् की खोज......

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भगवान=विश्वास
क्या आपको लगता है कि आप मंदिर मस्जिद या अन्य जगहों पर खोज सकोगे तो मेरा जबाव है नही...क्योकि हम भगवान को इन जगहों पर अपने स्वार्थ या दुःख के समय पर ही याद करते है.तो आपको क्या लगता है कि भगवान को हम स्वार्थ या दुःख के बदले में ,भगवान की कृपा पा सकते है. तो एक बार फिर मेरा जबाव होगा ..नही I हम भगवान को मंदिर मस्जिद या अन्य जगहों पर खोजने की बजाय हम भगवान को लोगो के दिलो में ,उनके प्यार प्यार में ,लोगो की दुःख के समय की गयी सेवा में ,या फिर बड़ो के आशीर्वाद में खोजे तो सायद हमें भगवान तो ना मिले पर सायद हम भगवान की इच्छा जरूर पूरी कर सकते है

भगवान क्या है ?

विश्वास ही भगवान है.
में आपको एक घटना का अनुभव बताता हु......
एक बार एक छोटा बालक घर से दुखी होकर भगवान की खोज में निगल पड़ा .वो अपने घर से थोड़ी दूर ही पंहुचा होगा की उसे पार्क में एक ब्रद्ध महिला दिखाई दी .वो बहुत उदास थी उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था कि वो कितनी दुखी थी कुछ देर उस महिला को देखने के बाद बालक उसके पास गया और उसकी बगल में जाकर बैठ गया.वो बहुत देर तक इसे ही बैठे दोनों ही एक दुसरे से बात नही कर रहे थे बहुत समय बाद जब बालक को भूक लगी तो उसने अपने छोटे से बैग से ब्रेड निकाली और खाने लगा ..बालक ने देखा की महिला उसकी ओर देख रही है तो बालक को लगा की सायद वो महिला भी भूकी है.तो उसने अपनी एक ब्रेड उस महिला को दे दी .महिला के चेहरे पर थोड़ी सी खुसी छा गयी ..बालक को वो मुस्कान बहुत अच्छी लगी इसलिए उसने अपनी एक दूसरी ब्रेड भी उस महिला को दे दी ...इस बार महिला के चेहरे पर ज्यादा खुसी थी और अंत में बालक ने अपने सारे खाने की चीजे उस महिला को दे दी उन्हें खाकर महिला का चेहरा खुसी से खिल उठा ....और बालक उस चेहरे को देखकर बाहुत खुस हुआ और फिर कुछ देर उन्होंने बात की और दोनों अपने अपने घर चले गए ..जब बालक घर पंहुचा तो उसकी माँ ने पूंचा इतनी देर खा थे बालक ने कहा माँ आज मेने भगवान को देखा वो बहुत सुन्दर है और उसने हंस कर मुझसे बात की .....और जब वो ब्रद्ध महिला अपने घर पहुची तो उसके चेहरे की खुसी देखकर उसकी बहु ने पूछा ,माँ जी आज आप इतनी खुस कैसे हो तो उस महिला ने जबाव दिया बेटा ‘आज मेरी मुलाकात भगवान से हुई वो बहुत अच्छा है उसने मुझे अपना खाना दिया उसने मुझसे बात की और एक बात और वो बहुत छोटा है.......
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Tuesday, January 9, 2018

वो पहली मुलाकात



वो पहली मुलाक़ात
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"क्या हुआ दोस्त आज इतना बैचैन क्यु हो ,क्या हुआ जो आज आपकी ही धड़कन आपके वश में नहीं है" अपने हालात को देखते हुए मेरे दिमाग ने मेरे दिल से ये प्रश्न किया ।
दिल- सच कहते हो तुम ,शायद आज कुछ खास है या फिर इसे अपने ही गम में बैठने का गम है ।
दिमाग- किस गम कि बात कर रहे हो तो , "वो जो आज से तीन साल पहले" मिला था या फिर कोई और ही गम है ।
      "आज से तीन साल पहले " ये शब्द सुनकर दिल बहुत उदास हो गया ।कुछ कही अनकही तस्वीरें उसके सामने से गुजरने लगी ।उस तस्वीरों में कुछ खास था जिसे देख दिमाग ने भी चलना बंद कर दिया दोनो ही अपने उन हसीन पलों को देख रहे थे वो पल कितने हसीन होंगे जिन्हें याद करके दिल और दिमाग दोनों ही  आनंदित हो रहे । कभी किसी पल खुशी छलकाती तो कभी उदासी ।
         उन दोनों के इस दृश्य ने मुझे अन्दर तक हिला दिया । में एकदम से बैठ गया , मेरी आंखो के सामने वो दृश्य आ गया जब मैने उसके उन कोमल ,हसीन ,और सुन्दर हाथों को स्पर्श किया था मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि वो अभी मेरे हाथो में है उसका वो खूबसूरत चेहरा मेरी आंखो के सामने आ गया और मेरी आंखो से कुछ हसीन यादें बह गई । उन यादों की धारा में, मै भी बहता चला गया मैने खुद को उन यादों के हवाले कर दिया ,क्युकी वो यादें ही मुझे खुशी का एहसास कराती थी ।
      "क्या चाहते हो तुम ,खुद को पाना या उसकी यादों में ही उसकी बाहों के घेरे में खुद को छिपाना" ,एकाएक मेरी यादों ने मुझे झकझोर के पूछा ।
  "वो खूबसूरत चेहरा....एकदम से सामने आ गया और उसमे खो गया ।
शाम का समय था कुछ पुरानी यादो ने घेर रखा था शायद वो ख़ूबसूरत ही रही होगी जिस कारण में उनमे इतना खो गया था ज्यादा कुछ याद भी नही आ रहा था बस एक चेहरा जो बार बार आँखों के सामने आ जाता था पता नही में उसे भूलना नही चाहता था या फिर वो मुझे भूलने नही दे रहा था तभी मेरा ध्यान टूटा ।
        हाल ही की हुई घटनाओ के कारण में किसी से ज्यादा बात नही कारता था मेने बहुत कुछ बदलने के कोशिश की पर शायद अभी समय नही था
   में वंहा से उठकर बाहर चला गया में खुद को खुश देखना चाहता था मुझे क्या पता था कि आज का दिन मेरी जिंदगी में एक ऐसा समय लायेगा जिसे में भूलना ही नही चाहुगा ।में घर से निकल तो गया था पर मेरा मन नही लग रहा था इधर उधर की बाते सोचता रहा पर दिल को सुकून नही मिला ।
       लगभग 4 से 5 बजे के बीच का समय होगा  अप्रैल 2015 का महीना था घूमने के बाद में घर आ गया ""हेल्लो कैसे हो ,क्या में तुमसे बात कर सकती हूँ"   ...।
     मैंने नज़ारे ऊपर उठकर देखा मेरे दिल की धड़कन थम सी गयी मनो किसी की आहट से किसी की नींद टूटने का खतरा हो .में बस उसे एक पल के लिए देखता रह गया जो शायद दिल में बस गया था
    "वो एक खूबसूरत चेहरा"
में अपनी यादों की यादों में इतना खो गया कि मुझे मेरी फिर से झकझोर दिया ।
   "यादों के सहारे जीना मुझे बहुत कठिन सा लग रहा था , पर जब उसने उस पहली मुलाकात में मुझे मुस्करा कर देखा था । उसके उन गुलाबी होंठो ने जब एक दूसरे को चूमा था उसकी पलकों ने खुद को अपनी बाहों में लिया था उसकी हर धड़कन से एक मधुर आवाज एक संगीत की तरह मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही थी ।जब उसकी उंगलियों ने मेरी उंगलियों को गले लगाया तो मुझे उसकी हर धड़कन अपने दिल की धड़कन के साथ ही सुनाई देने लगी ।लगा मानो दो दिल एक साथ धड़क रहे हों ।
     " अब तुम ही बताओ इन सब को में कैसे भूल सकता हूं" मैने अपनी यादों से कहा ।
और सोचने लगा कि कैसे भूल जाऊ उसका मुझे गले लगाना , उस एहसास से जीने का एहसास होता है मेरे साथ वो सब पहली बार ही तो हुआ था फिर कैसे भूल जाऊ वो ..
    " पहली मुलाकात"

अनोखा रिश्ता

अनोखा रिश्ता-1 ---------------------------------------------- शाम का समय था लगभग 7 बजे होंगे ,एक टेबल पर बैठा करन कॉफी पी रहा था चार...