Friday, August 24, 2018

मैं एक लड़की हूँ


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कब हँसना है कब चुप हो जाना सब जानती हूँ मैं, 
लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ|
कब बैठना है किसके सम्मान में खड़े रहना है अपनी हैसियत की देहलीज पहचानती हूँ, 
क्योंकि लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ |
मैं एक काठ की कठपुतली हूँ जिसके जज्बातो
की कोई कीमत नही, 
 सूख गये अब तो आँसू भी मेरे, इन आँखों में आँसू लाऊँ कैसे, 
रूठ गयी हैं अब तो किस्मत भी मेरी मुझसे, 
इसे मनाऊँ कैसे |
कितना दुःख पाना है सुख की चाह में जानती हूँ मैं, 
क्योंकि लड़की हूँ मैं, अपनी मर्यादा जानती हूँ मैं |
ना जानने का हक है मुझे घर के बाहर की दुनिया ,घर की देहलीज को ही सबकुछ मानती हूँ मैं, 
लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ ||
तन्हाई मेरी साथी है, आँसू मेरी किस्मत इन्हें ठुकराऊँ कैसे, 
रूठ गयी मेरी किस्मत मुझसे इसे मनाऊँ कैसे, 
लड़की हूँ मैं अपनी मर्यादा जानती हूँ, 
इस कड़वे सच को ठुकराऊँ कैसे, 
कभी जन्म से पहले ही मार दी जाती हूँ, 
और अगर बच गयी तो दहेज के नाम पर जला दी जाती  हूँ, 
क्योंकि मै एक लड़की हूँ, और अपनी मर्यादा जानती हूँ |
मैं किसी की बेटी बन घर को किलकारियो से गुंजा जाती हूँ, 
फिर भी ना जाने क्यूँ मार दी जाती हूँ, 
कभी किसी की बहन बन अपने  भाई की सुरक्षा की मन्नते मांगती हूँ, और खुद ही दहेज के नाम पर असुरक्षित हो जाती हूँ, 
क्योंकि मै एक लड़की हूँ? 
कहीं पर मै एक माँ हूँ फिर भी धन के लालच में अपने ही बेटे के हाथों मारी जाती हूँ, 
जिस परिवार में कदम रख उसे संवारा हैं, उस परिवार को मुझे दो पल की  खुशियाँ देना लगता अब गवारा है, 
क्योंकि मै एक लड़की हूँ  ?
अपनी मर्यादा जानती हूँ ||
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-नवनीता

Wednesday, July 25, 2018

मेरे आंगन के पेड़ से


मेरे आंगन के पेड़ से

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अठखेलियाँ खाती, अपने केश बिखराती,
रंग बिरंगे फूलों के गहनों से सजी,
एक लता बेवजह लिपट गई
मेरे आँगन के पेड़ से।
 
कहाँ से निकली पता नहीं,
कहाँ रुकेगी पता नहीं,
पर बाँध लेगी अपनी बाँहों में बेसुध,
मोहब्बत सी हो गई जैसे
मेरे आँगन के पेड़ से।
 
डाल से डाल चलने लगे,
पात से पात हिलने लगे,
दो शरीर एक जान से
एक दूसरे मे वो मिलने लगे,
नहीं मिली अगर वजह,
पूछना उनका परिचय,
मेरे आँगन के पेड़ से।
 
कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते हैं,
वो मूक होते हैं,
अकल्पनीय किन्तु विस्तृत,
उस असीम प्रेम की तरह
उलझे हुए,
धूप, जाड़े और बारिश में,
मेरे आँगन के पेड़ से।
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-रवि पँवार

Saturday, July 14, 2018

जिस मृग पर कस्तूरी है

जिस मृग पर कस्तूरी है

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मिलना और बिछुड़ना दोनों
जीवन की मजबूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

शाखों से फूलों की बिछुड़न
फूलों से पंखुड़ियों की
आँखों से आँसू की बिछुड़न
होंठों से बाँसुरियों की
तट से नव लहरों की बिछुड़न
पनघट से गागरियों की
सागर से बादल की बिछुड़न
बादल से बीजुरियों की
जंगल जंगल भटकेगा ही
जिस मृग पर कस्तूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

सुबह हुए तो मिले रात-दिन
माना रोज बिछुड़ते हैं
धरती पर आते हैं पंछी
चाहे ऊँचा उड़ते हैं
सीधे सादे रस्ते भी तो
कहीं कहीं पर मुड़ते हैं
अगर हृदय में प्यार रहे तो
टूट टूटकर जुड़ते हैं
हमने देखा है बिछुड़ों को
मिलना बहुत जरूरी है।
उतने ही हम पास रहेंगे,
जितनी हममें दूरी है।

- कूअर बेचैन

Wednesday, July 11, 2018

मजा आता है

मजा आता है

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पिघल जाए मोम, तो बाती को जलने में मज़ा आता है,
साथ हो अपने तो सूरज के ढलने में मज़ा आता है,
और चुनौतियों का शौक होता है जिन्हें,
उन्हें पत्थरों पर चलने में मज़ा आता है।
नौरस के दिनों की उफ़
नींद को भी सोने में मज़ा आता है,
और वो खुशी के होते हैं,
हर एक आँसू को रोने में मज़ा आता है।
कायर हैं जो बदनसीब,
उन्हें हर पल डरने में मज़ा आता है,
है मोहब्बत अगर वतन के लिए,
तो हर शहीद को मरने में मज़ा आता हैं।
पागल दरअसल पागल नहीं होता,
उसे खुद से उलझने में मज़ा आता है,
खुदा सा दोस्त मिल जाए अगर,
तो गिर के सम्भलने में मज़ा आता है।
उतार सका क़र्ज़ माँ का अगर
तो मुझको बिकने में मज़ा आता है,
क्या-क्या लिख देती है रवि की कलम,
सच कहूँ तो उसको लिखने में मज़ा आता है।

- रवि पंवार

Wednesday, June 20, 2018

वो कुछ लम्हें...


वो कुछ लम्हें.....

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वो कुछ पल जो बयां नही किये जा सकते
कैसे कह दूँ वो लम्हें भुलाये नही जा सकते
तुम्हारे होठों की वो पहली छुवन
सांसो की वो गरमाहट
तुम्हरी जुल्फों के वो वेराहे रास्ते
जो शायद तुझ तक नही जाते ..
उस रास्ते के वो दर्द बयां नही किये जा सकते
कैसे कह दू वो लम्हे भुलाये नही जा सकते....|

आज यादों ने मुझसे मिलने की कोशिश की है
उन यादों में थोड़ी धुन्दलाहट सी है
तुमको न पाने की बेबसी भी है
यादों की श्याही समय के पन्नो पर
बड़ी लाचार सी लगती है
पन्नो का क्यों मुझमे एकीकार नही किया जा सकता
फिर कैसे कह दू की उन लम्हों को भुलाया नही जा सकता ||

Sunday, April 22, 2018

ये पूछा मत करो

ये मत पूछा करो

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मुझसे होता न बयाँ, ये पूछा मत करो,
राज दिल में है क्या, ये पूछा मत करो।
रात बनके हवा छू लिया था तुम्हें,
ख्वाब था या हक़ीक़त, ये पूछा मत करो।
देखा तुमको तो ये परेशान हो उठी,
इन आँखों की गुफ्तगू, ये पूछा मत करो।
जब नहीं आए तुम हिचकिया आ गई,
पर आई कितनी दफा, ये पूछा मत करो।
जब जानते हो कहेंगे हम "सुभानअल्लाह",
कैसे दिखते हो तुम, ये पूछा मत करो।
तहजीब इतनी कि मुकर जाते हैं हम,
क्या प्यार है हमसे, ये पूछा मत करो।
चल दिया उठ कर कहाँ ये पूछा तो करो,
कर दूंगा मना कि, ये पूछा मत करो।
मैं तो मिर्ज़ा था सिर्फ तेरा रहनुमा,
क्यों ग़ालिब बन गया, ये पूछा मत करो।

-Ravi Panwar

Thursday, April 19, 2018

वो बंद खिड़की


वो बंद खिड़की....?

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वो बंद खिड़की
वो शाम का समय था ज्यादातर लोग अपने अपने घरो से बाहर निकल रहे थे ऐसा लग रहा था मनो उन सब को उस मतवाली पवन ने बुलाया हो और वो सब एक अपनी प्रीयता से मिलने के लिए जा रहे थे ऐसा लग रहा था मानो एक पल की देरी भी इन्हें एक असहनीय वियोग का अनुभव करा रही हो | में भी उस भीड़ में शामिल हो गया | मै चल तो रहा था  पर मानो ऐसा लग रहा था की पवन मुझे अपने साथ कही ले जा रही हो , में अपने बिना गंतव्य की परवाह किये मैने खुद को उसके हवाले कर दिया |
     अभी कुछ समय भी नही गुजरा होगा कि मुझे पवन के झोंको ने मेरे सपनों से बाहर निकाला | मै अपनी वास्तविक दुनिया में आया , मै खुद के चारों तरफ़ देख रहा था ,एकाएक मेरी नजरें पवन के झोंके का पीछा करते हुए एक खिड़की पर गयी | ऐसा लगा मानो दुनिया थम सी गयी हो ..उसकी वो आँखे |
    पर पवन का इरादा कुछ और ही था उसने अपनी अठखेलिय थोड़ी बड़ा दी और अपने हाथो से उसकी बालों की लटों को सवारने लगी ,ऐसा लग रहा था मानो वो उसके स्पर्श से मुझे चिड़ा रही हो ,उसके बाल हवा में लहरा रहे थे उसके गालों की लाली मुझको रिझा रही थी में कुछ पल के लिए उस पल में खो गया और उस मासूमियत सी सूरत में खो गया ...में उसकी पलकों के उठने का इंतज़ार करता रहा पर शायद वो भी पवन के साथ मिली हुई थी मै उस पल को हवा का एक तोफा समझ कर उसे एक याद के रूप में रख लिया |
       अब तो हर रोज़ उस रोज़ का इंतज़ार होने लगा था खुद को बड़ी मुस्किल से याद रख पा रहा था खुद से खुद की जंग से होने लगी थी अगर आँखे बंद करता तो उसकी बंद पलकें आँखे खोलने न देती और अगर आँखे खोलता तो पल पल बेचेनी हो रही थी आखिर खुद ने खुद से एक समजौता किया खुद को “खुद*” के हवाले कर दिया मेने | पर खुद से खुद को हार कर भी जीता हुआ महसूस कर रहा था
  मै हर रोज़ वहा जाने लगा मुझे वो उसी जगह पर बैठी हुई मिलती है ऐसा लगता था मानो वो भी मेरा इंतज़ार कर रही हो | मै उस पल को कैद कर लेना चाहता था उस पल के साथ खो जाना चाहता था उस अनजानी चाहत को पहचान देना चाहता था मै उसे अपना बनाना चाहता था में उसे रोज़ इसी तरह मिलने लगा पर अब बेबसी बडती जा रही थी उसकी पलकों कि खिड़की कब खुलेगी |
     धीरे धीरे एक महिना गुजर गया | उसकी एक मुस्कराहट हर दुःख दूर कर देती थी उसकी दूरी अब सहन नही होती थी हर पल ख्याल आता था उसकी आँखे कैसी होंगी आँखों की वो नीली हया आँखों को सुकून देती थी जब पवन उसके होठों खो छूके गुजरती थी तो दिल में एक सिरहन सी दौड़ जाती थी फिर खुद उसके होठों को अपने होठों पर महसूस करता और उन बंद आँखों के सपनों में खुद को जीवंत महसूस करता |
        वही शाम का समय था सभी लोग फिर से अपनी प्रेयसी से मिलने जा रहे थे मै भी अपनी प्रेयसी से मिलने जाने लगा, पर आज हवाओ का रुख कुछ बदला बदला सा लग रहा था ऐसा लग रहा था मानो वो मुझे आज ले जाना नही चाहती थी पर में खुद खो रोक न पाया और चलने लगा मन में एक अजीब सी बैचेनी हो रही थी वहां पहुँच कर खुद की नजर उठाने की हिम्मत नही हो रही थी खुद को उसकी नजरों का पीछा करने को कहा और नजरे उस बंद खिड़की पर जाके रूक गयी, दिल को दर्द का एहसास हुआ पर आँखों ने बगावत कर दी खुद को ना रोक पायी और बगावत का नीर उन आँखों से बहने लगा | साँसों के साथ बहता दर्द आँखों से मिल रहा था
    फिर खुद को दिलासा दी और उस मकान की सीड़ियाँ चड़ने लगा ..हर एक पल उस पल की याद दिला देता जब उसकी नज़रों से मिलन हुआ था दिल एक अनहोनी की आहत से घबरा जाता | जब उसके कमरे के दरवाजे के पहुंचा तो उसे खोलने की हिम्मत ना हुई | एक झटके के साथ दरबाजा खोला अन्दर का नजारा एक अनहोनी को बयां कर रहा था सब कुछ खाली था बस एक खाली कुर्सी और एक बैसाखी थी जो अनहोनी का संकेत थी फिर नजर उस बंद खिड़की पर गयी, एक ख़त को देखा ,एक डर के साथ उसे खोला जब उसे पड़ने लगा था आँखों ने एक बार फिर बगावत कर दी|
    “इन आँखों की खता को माफ़ कर देना , पर में उन सपनों को नही खोना चाहती जो तुमने मुझे दिए ...जब तुम्हे पता चलता कि मेरे पैर नही है तो शायद तुम मुझे छोड़ देते इस ख्याल से ही में जा रही हूँ अब तक खुद को तो बचा लिया, पर खुद के अंश को कैसे बचाउंगी |
   मेने इस खिड़की से उस दुनिया को देखा है जो बहुत जालिम है हमें जीने का हक़ देना नही चाहती एक ओर आप प्यार की चाहत करते हो दूसरी ओर हमें जीने देना नही चाहते हो .....उस दुनिया में कैसे कदम रखू एक खौफ से भरी हुई है हर पल उन भेडियों की नजरों से बचना पड़ता है हर पल उन जालिमों का साया पीछा करता है
     तुम्हारी मोहब्बत का डर नही है डर तो उस बात का है की अपनी इस मोहब्बत की निशानी को दुनिया में कैसे लाऊंगी , अपनी उस लाड़ली को इन हैवानों से कब तक बचाउंगी ...उसे इस दुनिया में लाने से डर लगता है”
     इस से आगे पड़ ना पाया ,खुद को खुद की नजरों में गिरा हुआ पाया ऐसा लगा मानो उसकी इन बातों का क्या जबाब देता ...उसके लिए इस बंद खिड़की को कैसे खोल पाता क्युकी में भी इसी भेडियों के समाज का हिस्सा हूँ
     आज उस खिड़की खो खोलना चाहता हूँ उसे इस दुनिया से मिलाना चाहता हूँ उसे बताना चाहता हूँ की एक दिन ये लोग जरूर बदलेंगे | पर एक सवाल उस बंद खिड़की खोलने ने रोकता है
“क्या ये लोग बदलेंगे ...?”   
आपकी राय जरूर.......”वो बंद खिड़की”
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  -अनिल शर्मा

अनोखा रिश्ता

अनोखा रिश्ता-1 ---------------------------------------------- शाम का समय था लगभग 7 बजे होंगे ,एक टेबल पर बैठा करन कॉफी पी रहा था चार...